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संसद भवन का संपूर्ण इतिहास – Complete History Of Parliament House

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विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में भारत का नाम पहले नंबर पर है। लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ संसद है। संसद के माध्यम से ही देश में विभिन्न प्रकार की नीतियों एवं नियमों का निर्धारण किया जाता है। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि संसद ही लोकतंत्र की कसौटी है। इसी के द्वारा देश की नीतियों का निर्माण किया जाता है। भारत की संसद विश्व की सबसे बड़ी संसद है।

संसद क्या है?

भारत का संसद लोकतांत्रिक व्यवस्था की सर्वोच्च (सबसे बड़ी) विधायी निकाय प्रणाली है। संसद को लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण स्तम्भ कहा जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में देश के नागरिक अपने मतदान द्वारा प्रतिनिधियों का चुनाव कर निर्वाचित किया जाता है। संसद एक संवैधानिक निकाय है। लोकतांत्रिक स्तर पर संसद देश का सर्वोच्च निकाय है। संसद द्वारा ही देश के लिए कानूनों का निर्माण किया जाता है। संसद का निर्माण लोकसभा, राज्यसभा और राष्ट्रपति से मिलकर होता है। इस प्रकार केन्द्र स्तर पर स्थापित संघीय विधानमंडल को ही संसद कहा जाता है जो केन्द्र सरकार की रचना करती है। संसद द्वारा ही देश की नीतियों एवं अधिनियमों का निर्धारण किया जाता है।

संसद भवन का निर्माण

पुरानी संसद भवन का शिलान्यास अंग्रेजों द्वारा 12 फरवरी 1921 में हुआ तथा 1927 में यह बन कर तैयार हुई। पुरानी संसद का उद्घाटन 18 जनवरी 1927 में हुआ था। 556 मीटर व्यास में बने इस भवन के निर्माण में 83 लाख रूपए का खर्चा आया था। देश की आजादी के बाद संसद के लिए ज्यादा जगह की आवश्यकता हुई तो इसमें दो मंजिल और जोडी गई। जब इस भवन का निर्माण किया गया था उस समय इसे हाउस ऑफ पार्लियामेंट कहा जाता था। आजादी के बाद इसमें सांसद बैठने लगे थे इस लिए इसे संसद भवन कहा जाने लगा। पुराने संसद भवन का निर्माण भले ही विदेशी वास्तुकारों ने किया था लेकिन इसका डिजाइन मुरैना के चौंसठ योगिनी मंदिर से मिलता जुलता है।

संसद के कितने भाग है ?

भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली में संसद का स्थान सबसे ऊंचा है। अन्य शब्दों में कहे तो केन्द्र स्तर पर स्थापित संघीय विधानमंडल को संसद कहा जाता है जो केन्द्र सरकार बनाती है। भारतीय संसद मुख्य रूप से तीन अंगों से मिलकर बनी है।
लोकसभा (Lok Sabha)- लोक सभा संसद का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। लोकसभा के सांसदों को चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से मतदान के द्वारा किया जाता है। इसे संसद का निचला सदन भी कहा जाता है। इस प्रकार लोकसभा के माध्यम से जनता को वास्तविक प्रतिनिधित्व दिखाई देता है। लोकसभा में बहुमत दल का नेता या सत्ता पक्ष का नेता ही प्रधानमंत्री होता है। प्रधानमंत्री ही देश के प्रमुख के रूप में कार्य करता है।
राज्यसभा (Rajya Sabha)- राज्यसभा संसद का स्थायी सदन होता है। क्योकि इसके एक तिहाई सदस्य प्रत्येक 2 वर्ष में सेवानिवृत हो जाते हैं इस कारण यह निरंतर रूप से चलता रहता है। इसके सदस्यों का चुनाव राज्य विधानसभाओं के सदस्यों के द्वारा किया जाता है। इसे संसद का ऊपरी सदन भी कहा जाता है।
राष्ट्रपति (President)- राष्ट्रपति को देश का प्रथम नागरिक भी कहा जाता है। राष्ट्रपति देश का संवैधानिक प्रमुख होता है। राष्ट्रपति का चुनाव लोकसभा, राज्यसभा, एवं राज्यो की विधानसभा के सदस्यों द्वारा किया जाता है। राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद ही कोई कानून लागू हो पाता है।

सदस्यो का कार्यकाल एवं योग्यता

संसद के तीनों भागों के सदस्यों का कार्यकाल अलग अलग होता है। साथ ही तीनों ही भागों में पात्रता नियम भी अलग अलग होते हैं जो निम्न प्रकार हैं।
लोकसभा (Lok Sabha)- लोकसभा के सदस्य का कार्यकाल पद ग्रहण करने की तिथि से 5 वर्ष तक होता है। लोकसभा का सदस्य वही व्यक्ति हो सकता है जो भारत का नागरिक होने के साथ उसकी न्यूनतम आयु 25 वर्ष होना आवश्यक है।
राज्यसभा (Rajya Sabha)- राज्य सभा के सदस्यों का चुनाव राज्यविधानसभाओं के सदस्यों के द्वारा किया जाता है। राज्यसभा के सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष तक होता है। राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए नागरिक का 30 वर्ष का होना आवश्यक है।
राष्ट्रपति (President)- भारत के राष्ट्रपति को चुनाव लोकसभा सदस्यों, राज्यसभा सदस्यों एवं विधानसभा के सदस्यों द्वारा किया जाता है। भारत का राष्ट्रपति पद पर निर्वाचित होने के लिए नागरिक की न्यूनतम आयु 35 वर्ष होनी आवश्यक है।

संसद के कार्य

भारत की संसद का प्रमुख कार्य देश के हित के लिए नीति नियमों को बनाने के साथ साथ कानून व्यवस्था, देश की सुरक्षा, देश की आर्थिक राजनैतिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था को बनाने रखना है। यहां हम संसद के प्रमुख कार्यों का वर्णन कर रहे हैं।
कानून बनाना: संसद का सबसे प्रमुख कार्य जनता के हित में कानून बनाना है। वास्तव में विभिन्न कानूनों के माध्यम से ही जनता के हितों को सुरक्षित किया जाता है। इन्हीं कानूनों के द्वारा ही संसद व्यवस्थापिका के द्वारा अपना कार्य करती है। संसद को ही देश और जनता के हित में कानून बनाने का अधिकार है।
वित्त का नियंत्रण: देश के विकास के लिए वित्त का नियंत्रण अत्यंत आवश्यक होता है। इसी कारण प्रत्येक वर्ष संसद द्वारा बजट पेश किया जाता है। इसी बजट के द्वारा वित्त का नियंत्रण किया जाता है। एक अच्छा बजट ही देश का विकास कर सकता है।
कार्यपालिका का नियंत्रण: संसद द्वारा ही मंत्रिपरिषद के कार्यों को निर्धारित किया जाता है। मंत्रिपरिषद के कार्यों को सही प्रकार से अमल में लाने में संसद की महत्वपूर्ण भूमिका है। मंत्रिपरिषद तभी तक सत्ता में रह सकता है जब तक उसे संसद में बहुमत मिला हुआ है। बहुमत खत्म होते ही सामूहिक रूप से मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ जाता है।
चर्चा करना: जनता के हित को ध्यान में रखते हुए विभिन्न मुद्दों और प्रशासनिक कार्यों पर संसद में चर्चा की जाती है। इसमें सभी पक्षों पर पक्ष और विपक्ष द्वारा चर्चा की जाती है।
निर्वाचन करना: राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष एवं राज्यसभा अध्यक्षों को चुनने का कार्य भी संसद द्वारा ही किया जाता है। इतना ही नहीं विभिन्न संवैधानिक पदों पर कार्यरत अधिकारियों को पद का दुरूपयोग करने पर पद से हटाने का अधिकार भी संसद के पास होता है।

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